विपक्ष एक तरफ संसद के शीतकालीन सत्र के लिए रणनीति बना रहा है पर लगता है ममता बनर्जी का फोकस 2024 पर है। इसलिए वो विपक्ष की बैठक में शामिल नहीं हुईं। ममता बनर्जी लगातार देश के हर राज्यों में अपनी पकड़ को मजबूत करने में जुटी हुई हैं। इसी का प्रभाव त्रिपुरा के निकाय चुनावों में देखने को मिला है। भले ही निकाय चुनावों में 334 में से 329 सीटों पर भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की है, परंतु ममता बनर्जी की पार्टी का प्रदर्शन भी पहले से बेहतर दिखाई दिया है। ममता बनर्जी भी ठीक उसी तरह की रणनीति त्रिपुरा में भाजपा को हराने के लिए अपना रही हैं जो पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अपनाई थी।

हालांकि, टीएमसी को केवल एक ही सीट नसीब हुई है, परंतु 20 प्रतिशत वोट शेयर के साथ ये पार्टी राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वहीं, मकपा को 3 सीटें मिली है वो भी 16 फीसदी वोट शेयर के साथ। इस प्रदर्शन से टीएमसी के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई है, और विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी और बड़ी योजना के साथ काम कर सकती है।

गौर करें तो 2019 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी का कुल वोट शेयर केवल 0.4 फीसदी ही था, जबकि 2018 के विधानसभा चुनावों में केवल 0.3 फीसदी रहा। पिछले चुनावों की तुलना में टीएमसी के प्रदर्शन में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। स्पष्ट है ममता बनर्जी की पार्टी राज्य में कई बार बुरी से तरह जनता द्वारा नकार दी गई। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा चेहरा बनने की राह में ममता बनर्जी ने हार नहीं मानी। एक बार फिर से त्रिपुरा में किस्मत आजमाई और इस बार पार्टी का प्रदर्शन पिछले दो चुनावों के मुकाबले काफी बेहतर रहा है। कुछ ऐसा ही प्रदर्शन पश्चिम बंगाल में भाजपा और टीएमसी के बीच देखने को मिला था, जहां भाजपा ने साल दर साल अपने वोट शेयर बढ़ाए हैं।

उदाहरण से समझिए, इसी वर्ष पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में भले ही ममता बनर्जी आसानी से चुनाव जीत गईं, परंतु भाजपा का वोट शेयर 38.1 प्रतिशत रहा था। इसके साथ ही भाजपा को कुल 294 सीटों में से 77 सीटों पर जीत मिली थी। जबकि वर्ष 2016 के चुनावों में भाजपा को केवल 3 सीटें ही मिली थीं और वोट शेयर 10 फीसदी रहा था। भाजपा ने भी शुवेंदु अधिकारी जैसे चेहरों को टीएमसी से अपनी पार्टी में शामिल कर संगठन को मजबूत किया था। ठीक ऐसा ही ममता बनर्जी भी कर रही हैं।

भाजपा और कांग्रेस के असन्तुष्ट नेता टीएमसी का रुख कर रहे हैं। मुकुल रॉय के बाद भाजपा विधायक सौमेन रॉय, विश्वजीत दास, तन्मय घोष, पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो व एक अन्य विधायक टीएमसी में शामिल हो चुके हैं। इसके बाद राजिब बनर्जी, आशीष दास, सुष्मिता देव समेत कई बड़े नेता टीएमसी से जुड़ रहे हैं। इसके अलावा भाजपा की तरह ही ममता ने भी त्रिपुरा में हिंसा, भ्रष्टाचार और विकास के मुद्दे को हथियार बना लिया है। भाजपा पर ममता भी वही आरोप लगा रहीं हैं जो भाजपा ने बंगाल में ममता के खिलाफ लगाये थे। स्पष्ट है कि पूरे पूर्वोत्तर भारत में टीएमसी खुद को मजबूत करने की दिशा में तेजी से बढ़ रही है और इसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं।

हालांकि, वर्ष 2017 में पार्टी का आधार कमजोर हो गया था जब सुदीप रॉय बर्मन के नेतृत्व में उत्तर-पूर्वी राज्य में उसके सभी छह विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। अब वर्तमान में बढ़े जनाधार के साथ संगठन को मजबूत करने की दिशा में टीएमसी आगे बढ़ रही है।

वर्तमान में स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने ट्विटर पर कहा कि “ये एक पार्टी की शुरुआत के लिए आसाधरण है, जहां न के बराबर उपस्थिति थी वहाँ पार्टी ने सफलतापूर्वक स्थानीय निकाय चुनाव लड़ा और 20 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी बनी है।” उन्होंने आगे कहा, ”इस तथ्य के बावजूद कि हमने बमुश्किल 3 महीने पहले अपनी गतिविधियां शुरू कीं, जबकि भाजपा ने त्रिपुरा में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। त्रिपुरा टीएमसी के सभी बहादुर सैनिकों को उनके अनुकरणीय साहस के लिए बधाई।”

वहीं, भाजपा ने टीएमसी के दावों को खारिज कर दिया है और कहा है कि जनता ने विकास की सरकार को चुना है। हालांकि, इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि भाजपा के समक्ष राज्य में टीएमसी एक बड़े विकल्प के तौर पर खुद को पेश करने में जुटी है। यदि टीएमसी का प्रदर्शन ऐसे ही हर चुनावों में बेहतर होता गया तो हो सकता है 2023 के चुनावों में हमें त्रिपुरा में दिलचस्प मुकाबला देखने को मिले।



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