एक समय था जब शिवसेना और कांग्रेस (Congress) कट्टर विरोधी हुआ करते थे। आज ये दोनों पार्टियां गलबहियां करते हुए नजर आती है। महाराष्ट्र (Maharashtra) के बाद अब शिवसेना ने उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और गोवा (Goa) में भी मिलकर चुनाव लड़ने का निर्णय किया है। हालांकि, इससे कांग्रेस को तो कोई घाटा शायद ही हो, परंतु शिवसेना को आने वाले समय में बड़ा झटका अवश्य लग सकता है।

कैसे कांग्रेस के साथ जाना शिवसेना को पड़ेगा भारी?

शिवसेना हिंदुओं की पार्टी मानी जाती रही है जिसकी धर्मनिरपेक्ष पार्टी कांग्रेस से कभी बनी नहीं। या यूं कहें कांग्रेस के विरोध में ही बाला साहब ठाकरे ने शिवसेना की नींव रखी थी। बाला साहब ठाकरे के विचारों के विपरीत शिवसेना ने वर्ष 2019 में मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाया था। उस समय इसके समर्थकों में काफी नाराजगी देखने को मिली थी। इसका प्रभाव बीएमसी चुनावों में देखने को मिल सकता है। इसके अलावा,

  • हाल ही में सातारा जिले में कोऑपरेटिव चुनाव में शिवसेना कोटे के राज्यमंत्री शंभूराजे देसाई को हार झेलनी पड़ी है।
  • इसी वर्ष मई में सोलापुर जिले की पंढरपुर-मंगलवेढ़ा विधा सभा सीट पर हुए उपचुनाव में BJP ने महाविकस आघाडी को झटका देते हुए जीत दर्ज की थी।

अयोध्या (Ayodhya) यात्रा के दौरान उद्धव का विरोध हो, या वीर सावरकर के मुद्दे पर कांग्रेस के खिलाफ उसकी चुप्पी, या मुस्लिम आरक्षण देने पर जोर देना हो, इन मुद्दों के कारण शिवसेना की हिन्दुत्व वाली छवि पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है।

अब यूपी और गोवा के चुनावों में कांग्रेस के साथ जाने से शिवसेना को आगामी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (BMC Election) के 227 सीटों पर अगले वर्ष होने वाले चुनावों में बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है।

अन्य राज्य में कांग्रेस के साथ जाने से भाजपा को BMC चुनावों में शिवसेना को हिन्दुत्व के मुद्दे पर घेरने का फिर से अवसर मिल जाएगा।

वर्ष 2017 में भाजपा ने बड़ी बढ़त हासिल कर 82 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि शिवसेना को 84 सीटें मिली थी।

इस बार भाजपा शिवसेना को घेरते हुए मराठी वोट को एकजुट करने का प्रयास कर सकती है। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के प्रति भाजपा अपनी रैलियों में खासा आदर दिखा रही है जिससे शिवसेना के लिए राह कठिन हो सकती है।

कांग्रेस का साथ शिवसेना के आने से यूपी में भाजपा के लिए अवसर

पिछले कुछ समय से शिवसेना पार्टी अपने कोर हिन्दू वोट बैंक के साथ-साथ मुस्लिमों को भी लुभाने के प्रयास करती दिखाई दी है।

हालांकि, शिवसेना का कहना है कि वो भाजपा को उसी की रणनीति से हराएगी। राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व दोनों ही शिवसेना की विचारधारा का हिस्सा है जो भाजपा से भिन्न नहीं है। शिवसेना को भरोसा है कि वो भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाएगी।

परंतु एक वास्तविकता ये भी है कि एनसीपी (NCP) और कांग्रेस (Congress) के साथ जाने से शिवसेना की हिन्दुत्व वाली छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

  • जब महाराष्ट्र (Maharashtra) के सीएम उद्धव ठाकरे अयोध्या यात्रा के लिए निकले थे, तब अयोध्या के साधु संत उनका विरोध कर रहे थे।
  • पिछले वर्ष अयोध्या के स्वामी परमहंस ने तो विरोध करते हुए कहा था कि ‘बाला साहेब ठाकरे ने कहा था कि शिवसेना को हम कांग्रेस नहीं बनने देंगे। अगर ऐसा हुआ तो शिवसेना चुनाव नहीं लड़ेगी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन किया।’
  • हनुमानगढ़ी के पुजारी महंत राजू दास ने शिवसेना को सख्त चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘मुस्लिमों को 5 % आरक्षण देने वाली शिवसेना पार्टी अब हिंदुत्व के मार्ग से हट चुकी है, उद्धव को अयोध्या आने नहीं दूंगा।’
  • स्पष्ट है शिवसेना जो कभी हिन्दुत्व की छवि के लिए मशहूर थी, वो छवि धूमिल हुई है। जिस तरह से वीर सावरकर के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा आमने सामने रहते हैं इसका इस्तेमाल भी भाजपा शिवसेना के खिलाफ कर सकती है।

हो सकता है भाजपा (BJP) इसे अवसर में बदलकर यूपी के चुनावों में हिन्दू वोट का ध्रुवीकरण करे। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा एक बार फिर से यूपी के चुनावों के समीकरण अपने पक्ष में करने में सफल हो सकती है।

महाराष्ट्र (Maharashtra) के बाहर शिवसेना का रिकार्ड खराब

उत्तर प्रदेश और गोवा में शिवसेना कुछ खास कमाल शायद ही दिखा सके। शिव सेना का इतिहास देखें तो महाराष्ट्र के बाहर उसका रिकार्ड काफी खराब रहा है। ऐसा नहीं है कि शिवसेना आज ही महाराष्ट्र के बाहर अपने हाथ-पाँव मार रही है।

  • वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में शिवसेना को नोटा से भी कम वोट मिले थे। शिवसेना को 0.05 फीसदी वोट मिले थे, जबकि NOTA पर 1.68 फीसदी वोट थे।
  • दिल्ली (Delhi) में पार्टी की इकाई चर्चा में तो रही, परंतु कभी विधानसभा में सीट नहीं जीत सकी।
  • शिवसेना 1998 से शिवसेना राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ रही है, लेकिन कभी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाई
  • शिवसेना ने 90 के दशक में यूपी में 3 बार विधान सभा चुनाव लड़ा था, परंतु उसके हाथ वर्ष 1991 में केवल एक सीट आई थी।

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क्या कहा शिवसेना ने ?

बता दें कि शिवसेना (Shiv Sena) के सांसद संजय राउत (Sanjay Raut) ने बुधवार को नई दिल्ली (Delhi) में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने घोषणा करते हुए कहा, “हम उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और गोवा (Goa) में एक साथ काम करने पर विचार कर रहे हैं।”

गोवा (Goa) और यूपी में भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए शिवसेना कांग्रेस के साथ हाथ मिला रही है। यहाँ शिवसेना का उद्देश्य भाजपा को हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर घेरना है। अब शिवसेना का ये कदम उसे यूपी में कितना फायदा पहुंचता है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा ।

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