Updated: | Fri, 23 Jul 2021 12:25 PM (IST)

Sawan 2021: सावन का महीना अब कुछ ही दिनों में दस्तक देने वाला है, यह माह शिव भक्तों के लिए बहुत ही खास माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर आप इस माह पूर्णतः विधि-विधान के साथ भगवान भोलेनाथ की भक्ति करते हैं तो आपको मनवांछित फल की प्राप्ति हो सकती है। भगवान शिव को समर्पित सावन माह में चहुँ ओर शिव की भक्ति देखने को मिलती है। ऐसे में आज हम आपके सामने भगवान शिव से जुड़ा एक ऐसा विषय लेकर आए हैं, जिसके बारे में शायद आपने कभी नहीं सोचा होगा।

हम सभी जानते हैं कि शिवलिंग के ऊपर एक कलश रखा जाता है, जिसमें से निरंतर बूंद-बूंद पानी की बूंदे नीचे स्थापित शिवलिंग पर टपकती रहती हैं। इसके अलावा शिवलिंग से निकली जल निकासी नलिका, जिसे जलाधारी कहा जाता है, उसे भी परिक्रमा के दौरान लांघा नहीं जाता है। इतना सब जान लेने के बाद अब आपके भी मन में ये सवाल तो पैदा होता ही होगा कि आखिर कि हर शिवलिंग के ऊपर रखे कलश से बूंद-बूंद पानी गिरने का रहस्य क्या है एवं परिक्रमा के दौरान आखिर जलाधारी को लांघा क्यों नहीं जाता? चलिए जानते हैं इन रहस्यों के बारे में….

समुद्र मंथन से जुड़ा है ये कारण

इन दोनों रहस्यों से अगर पर्दा उठाएं तो इसका सीधा संबंध समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है। दरअसल समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को पीने के बाद महादेव का गला नीला पड़ गया था और उनके शरीर में बहुत ज्यादा जलन हो रही थी। उनका मस्तक गर्म हो गया था। तब उनके सिर और माथे को ठंडक पहुंचाने के लिए उनके ऊपर जल चढ़ाया गया। ऐसा करने से भगवान महादेव के शरीर को थोड़ी ठंडक मिली। तभी से महादेव को जलाभिषेक अत्यंत प्रिय हो गया। इसीलिए महादेव के भक्त उनकी पूजा के दौरान जलाभिषेक जरूर करते हैं और यही कारण है कि शिव जी को ठंडक पहुंचाने के लिए शिवलिंग के ऊपर बूंद-बूंद टपकने वाला कलश रखा जाता है।

ये वैज्ञानिक कारण कर देगा हैरान

शिवलिंग पर कलश द्वारा टपकती बूंदों का अगर वैज्ञानिक कारण जानें तो ये बहुत ही शक्तिशाली सृजन है। इसके अनुसार शिवलिंग एक न्यूक्लियर रिएक्टर के रूप में कार्य करता है। यदि आप भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठाकर देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि भारत सरकार के न्यूक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है। एक शिवलिंग एक न्यूक्लियर रिएक्टर की तरह रेडियो एक्टिव एनर्जी से भरा होता है। इस प्रलयकारी ऊर्जा को शांत रखने के लिए ही हर शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है। वहीं कुछ मंदिरों में कलश में जल भरकर शिवलिंग के ऊपर इस तरह से रख दिया जाता है कि उसमें से निरंतर बूंद-बूंद पानी टपकता रहे।

जलधारी को लांघना इसलिए वर्जित है

वहीं अब जलधारी की अगर बात करें तो परिक्रमा के दौरान इसे भी लांघना वर्जित माना गया है। इस बात से तो आप भी परिचित होंगे कि सभी मंदिरों की और देवताओं की पूरी पक्रिमा की जाती है लेकिन शिवलिंग की चंद्राकार परिक्रमा की जाती है। यानी शिव के भक्त उनके जलाधारी को लांघते नहीं, वहीं से वापस लौट आते हैं। इसके पीछे अगर वैज्ञानिक कारण देखें तो शिवलिंग पर चढ़ा पानी रेडियो एक्टिव एनर्जी से भरपूर हो जाता है। ऐसे में इसे लांघने पर ये ऊर्जा पैरों के बीच से शरीर में प्रवेश कर जाती है। इसकी वजह से व्यक्ति को वीर्य या रज संबधित शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए शास्त्रों में जलाधारी को लांघना पाप माना गया है।

Posted By: Arvind Dubey

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